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Health & wealth: नवंबर 2017
It is also called - Pancreas Inflammetion.
It may be acute or chronic. पैनक्रियाज में सूजन -
इसके कई साधारण लक्षण होते हैं ।
जैसे -
➡पेट के ऊपरी भाग में तेज या मंद - मंद दर्द का अनुभव,
➡ह्रदय का तेज दर्द या धड़कना,
➡पेट फूलना,
➡भूख नहीं लगना,
➡मिचली, उल्टी या
➡दस्त होना,
➡पाखाना में आंव आना,
➡पुरे शरीर में पसीना आना,
➡वजन घटना इत्यादि ।
➡यह कुछ दिनों के लिए भी हो सकता है और कई बार वर्षों तक भी रह सकता है ।
➡भारत में इसके मामले बहुत तेजी से बढ़ रहे हैं । एक अनुमान लगाया जा रहा है कि प्रतिवर्ष लगभग 10 लाख व्यक्ति इससे पीड़ित हो रहे हैं । इसकी चिकित्सा के लिए चिकित्सक से परामर्श एवं सघन जांच आवश्यक है । विशेष सावधानी: - आपको जो जानकारी दी जा रही है, वह इस बात का सामान्य विवरण है कि किसी चिकित्सकीय स्थिति में आमतौर पर )या होता है, परंतु वह सभी लोगोंपर लागू नहींहोता. यह जानकारी चिकित्सकीय सलाह नहीं है, इसिलए यदि आपको कोई चिकित्सकीय परामर्श या सहायता कि आवश्यकता हो तो किसी चिकित्सक से संपर्क कीजिये. यदि आपको लगता है किआप किसी चिकित्सकीय आपातस्थिति में हो सकते हैं तो निश्चित ही अपने चिकित्सक से संपर्क स्थापित कीजिये या आपातकालीन नंबर पर तुरंत कॉल कीजिये ।
शरीर के विभिन्न भागों की सूजन - चिकित्सा में न करें देरी |
चेहरे
पर सूजन, पैरों
में सूजन , हाथों
में सूजन, जीभ
में सूजन, आंखों
की सूजन, पेट
में सूजन, क्या है यह समस्या और इससे कैसे बचे रह सकते हैं आप, कैसे होती है यह समस्या ? क्या है इसका समाधान ? सूजन से कैसे बचा जाए ? सूजन
को कम करने के क्या हैं उपाय ? आईये जानें -
Dr.
Prakash
Ellam
ram Chowk,
Bettiah
– 845438
Cell
– 9135167135.
सूजन की समस्या को हल्के में न लें।
यह कई तरह की बड़ी-बड़ी समस्याएं पैदा कर सकती है।
अचानक एक पैर में सूजन, लाली और गर्माहट तथा चलने-फिरने पर पैर में खिंचाव जैसे लक्षण डीप वेन
थ्रोम्बोसिस (डी.वी.टी.) यानी टांगों की नसों में खून के कतरों का जमाव अत्यंत
गंभीर स्थिति के सूचक हो सकते हैं। साधारणतः लोग अज्ञानता के कारण इसे नस में खिंचाव, चोट, थकान, सामान्य संक्रमण या फाइलेरिया
मान लेते हैं और उसका चिकित्सा कराने लगते हैं।
सामान्य
डॉक्टर भी इसे फाइलेरिया, सायटिका अथवा नस उखड़ना मान लेते हैं। फाइलेरिया के चिकित्सा के नाम पर कई सप्ताह तक पीड़ितों को
दवाएं देते हैंया फिर हड्डी विशेषज्ञ नस उखड़ने के चिकित्सा के नाम पर रोगी के
पैर पर वजन लटका देते हैं। चिकित्सा के इन गलत तौर-तरीकों से डीप वेन थ्रोम्बोसिस की समस्या गंभीर हो जाती है और एक समय रोगी की जान खतरे में पड़ जाती है।
क्या हैं
कारण :- विशेष तौर
पर पैरों की कसरत नहीं करने, किसी व्याधि या ऑप्रेशन के कारण लंबे समय तक विछावन पर पड़े रहने और डॉक्टर
की परामर्श के बिना अधिक दिनों तक हारमोन अथवा गर्भ निरोधक औषधियों के सेवन करने पर डीप
वेन थ्रोम्बोसिस का खतरा अधिक रहता है। इसके अलावा फेफड़े, पैंक्रियाज या आंतों का कैंसर होने और
किसी खराबी या व्याधि के कारण रक्त की आवश्यकता से अधिक गाढ़ा हो जाने पर भी यह समस्या हो सकता है। गर्भवती महिलाओं में प्रसव के तुरंत बाद यह व्याधि हो सकता है। इसके
अलावा लकवे से पीड़ित महिला को यह समस्या होने की आशंका अधिक रहती है, क्योंकि ऐसे पीड़ित व्यायाम नहीं कर पाते
तथा उनके रक्त में गाढ़े होने की प्रवृत्ति अधिक रहती है।
कभी-कभी पूरे शरीर में या
फिर किसी अंग विशेष में सूजन आ जाती है। विशेष रूप से हम इसकी अनदेखी करते हैं या फिर
दर्द निवारक तेल व मरहम से इसे दूर करने का प्रयास करते हैं। पर हर बार यह लापरवाही
ठीक नहीं। यह सूजन शरीर में छिपी किसी बड़ी व्याधि का संकेत भी हो सकती है।
चेहरे या शरीर के किसी
हिस्से में लंबे समय से बनी हुई सूजन को देख कर भी अनदेखा करना समझदारी नहीं है।
यदि शरीर में बार-बार पानी एकत्र हो रहा है तो यह हृदय, लिवर
या किडनी की किसी समस्या का संकेत हो सकता है।
जब शरीर में अतिरिक्त
फ्लूइड यानी पानी इकट्ठा हो जाता है तो शरीर में सूजन आने लगती है, जिसे
एडिमा कहा जाता है। जब यह सूजन टखनों, पैरों और टांगों में आती है तो उसे पेरिफेरल एडिमा
कहते हैं। फेफड़ों की सूजन पलमोनरी एडिमा और आंखों के पास आने वाली सूजन
पेरिऑरबिटल एडिमा कहलाती है। शरीर के ज्यादातर भागों में दिखायी पड़ने वाली सूजन
को मैसिव एडिमा कहा जाता है। इस स्थिति मेंमसूड़ों, पेट, चेहरे, स्तन, लसिका
ग्रंथि व जोड़ों आदि सभी भागों पर सूजन आ जाती है। ज्यादा देर तक खड़े रहने या
बैठने की वजह से होने वाली सूजन को ऑर्थोस्टेटिक एडिमा कहा जाता है। हल्की सूजन
ज्यादातर कोई बड़ी समस्या नहीं होती, लेकिन अधिक समय तक रहने वाली ज्यादा सूजन गंभीर
बीमारी का संकेत हो सकती है।
महिलाएं
पैरों में सूजन यानी डीप वेन थ्रोम्बोसिस की शिकार अधिक होती हैं। वर्तमान समय
में व्यायाम नहीं करने की प्रवृत्ति और महिलाओं में गर्भनिरोधक औषधयों एवं हारमोन
के बढ़ते सेवन के कारण डीप वेन थ्रोम्बोसिस का प्रकोप बढ़ रहा है। इसके अलावा फैशन
के प्रभाव में ऊंची एड़ी यानी हाई हील वाली सैंडिलों के प्रचलन से भी इस व्याधि का खतरा बढ़ता है।
पेट या शरीर के किसी भी
अंग में एक सप्ताह से अधिक सूजन रहने पर डॉक्टर से संपर्क करना आवश्यक हो जाता
है। पुरुषों की तुलना में महिलाओं में ऐसे मामले अधिक देखने को मिलते हैं। ऐसा
इसलिए भी कि पुरुषों के तुलना में महिलाओं में वसा का अनुपात अधिक होता है और वसा
कोशिकाएं अतिरिक्त पानी संचित कर लेती हैं। नियमित व्यायाम व खान-पान में लापरवाही
भी एडिमा की स्थिति को अधिक बढ़ा सकती है।
पैरों और
टखनों में सूजन और इसके साथ सांस फूलना, अधिक थकान, वजन कम होना, लगातार खांसी
और हृदय की तेज धड़कन-हार्ट के काम करने की गति कम होने यानी हार्ट फेलियर के
लक्षण हो सकते हैं। पैरों और टखनों की सूजन शरीर में तरल जमा होने से होती है जो
खराब होते हार्ट का संकेत हो सकती है। पैरों में तरल जमा होने का कारण हृदय से खून
का प्रवाह कम होना होता है। इससे पेट और शरीर के निचले हिस्से में तरल जमा होता है
और प्रवाह बाधित होता है।
डीप वेन थ्रोम्बोसिस को
समझने के लिए हाथ या पैर में रक्त संचार को समझना आवश्यक है। पैर या हाथों की
शिराएं यानी वेन्स ऑक्सीजन रहित गंदे रक्त को इकट्ठा करके हृदय की ओर ले जाती है।
वहां से अशुद्ध रक्त शुद्ध होने के लिए फेफड़े में जाता है। कई बार इन शिराओं में रक्त के कतरे जमा होकर रक्त के बहाव को रोक देते हैं। इससे शिराएं जाम हो जाती हैं, जिसके फलस्वरूप पैर या हाथ में सूजन होने लगती है। यह
डीप वेन थ्रोम्बोसिस की प्रारंभिक स्थिति है और इसका समय पर समुचित चिकित्सा न होने पर पैर या
हाथ काटने या मरीज की जान जाने की स्थिति भी आ सकती है।
इस व्याधि में पैर या हाथ में गंदे रक्त के साथ-साथ शरीर का पानी और इलेक्ट्रोलाइट्स एवं
खनिज जैसे जरूरी अवयव भी जमा हो जाते हैं। इससे शरीर की अंदरूनी क्रियाएं गंभीर
रूप से बाधित हो जाती हैं। इससे फ्लेग्मेसिया सेरूलिया डोलेन्स (पी.सी.डी.) नामक
जानलेवा स्थिति पैदा हो सकती है। पैर तथा हाथ की शिराओं में गंदे रक्त, पानी एवं अन्य जरूरी अवयवों के जमा हो
जाने से शिराओं में ऊतक दबाव बहुत अधिक बढ़ जाता है। इससे शुद्ध रक्त ले जाने वाली
रक्त धमनियां बाधित हो जाती हैं और धमनियों में भी रक्त का बहाव रुक जाता है। इससे
पैर अथवा हाथ काले पड़ने लगते हैं और गैंगरीन नामक भयंकर अवस्था की शुरुआत हो जाती
है। गैंगरीन हो जाने पर टांग या पैर काटने के अलावा और कोई उपाय नहीं बचता।
ह्रदय से जुड़ी व्याधियों, किडनी
की समस्या, असंतुलित हॉरमोन और स्टेरॉयड औषधियों के सेवन के कारण से एडिमा की समस्या हो सकती
है। दरअसल इन सभी स्थितियों में हमारी किडनी सोडियम को संचित कर लेती है। हालांकि
कुछ महिलाओं को मासिक धर्म के एक सप्ताह पहले भी कुछ ऐसे ही लक्षण नजर आते हैं। इस
दौरान एस्ट्रोजन हारमोन की मात्रा बढ़ जाती है, जिसकी वजह से किडनी ज्यादा पानी रोकना शुरू कर देती
है। हमारा अनियमित भोजन व जीवनचर्या भी एडिमा की बड़ी वजह है।
हार्ट फेलियर
के लक्षण हमेशा स्पष्ट नहीं होते हैं। संभव है कि कुछ लोगों में हार्ट फेलियर के
बहुत ही प्रारंभिक चरण में कोई लक्षण हो ही नहीं। हार्ट फेलियर के लक्षण सामान्यतः धीरे-धीरे सामने आते हैं। सबसे पहले, ये ऐसे ही समय में हो सकते हैं, जब आप बहुत
सक्रिय हों। कुछ समय बाद आपको सांस लेने में समस्या अनुभव हो सकती है और फिर अन्य
लक्षण तब सामने आते हैं, जब आप विश्राम कर रहे हों। हृदय जब हार्ट अटैक या
किसी अन्य कारण से क्षतिग्रस्त हो जाए तो लक्षण अचानक भी सामने आ सकते हैं।
पेट में सूजन कब्ज, गैस, काबरेनेटेड
ड्रिंक्स और फूड एलर्जी के कारण हो सकती है। अधिक फास्ट व जंक फूड के सेवन से भी
ऐसा होता है। हाई प्रोसेस्ड फूड में सोडियम की मात्रा अधिक और फाइबर कम होता है, जो पेट
में भारीपन और सूजन का कारण बन सकता है। इसलिए डिब्बा बंद आहार या प्रोसेस्ड आहार
लेते समय सोडियम की मात्रा जांच लें। अधिक सोडियम का शरीर में जाना सूजन का कारण
बन जाता है। इसके अलावा ब्लड प्रेशर, डायबिटीज की दवाओं व हारमोनल थेरेपी की वजह से भी
सूजन देखने को मिलती है। पेट की सूजन को दूर करने के लिए पर्याप्त मात्रा में पानी
पीना चाहिए। खाने के बाद अजवायन में काला नमक मिला कर खाने से पाचन एकदम सही हो जाता है और सूजन भी नहीं होती। अधिक शराब पीने वालों का लिवर सिकुड़ने के कारण से भी पेट पर सूजन आ जाती है। मूत्र पीला आने लगता है। ऐसे में यथाशीघ्र डॉक्टर से परामर्श लें।
लोग थकान और
सांस फूलने जैसे लक्षणों को बढ़ती आयु के संकेत के रूप में अनदेखा कर देते हैं।
हालांकि, कभी-कभी हृदय
पर्याप्त रक्त पंप करने और आपके अंगों- किडनी और मस्तिष्क को इसकी सप्लाई करने
में सक्षम नहीं होता है तो आप कई तरह के लक्षण अनुभव कर सकते हैं। इनमें रात में
ज्यादा मूत्र आना, स्मरणशक्ति कम होना और भ्रम शामिल हैं।
चेहरे
पर सूजन - इसके कई कारण हो सकते हैं, जैसे - फ्लूइड का इकट्ठा होना, चोट लगना, संक्रमण या फिर कैंसर। यह सूजन गाल, आंख व
होठों के पास भी होती है। इस तरह की सूजन को मेडिकल साइंस में फेशियल एडिमा कहते
हैं। यदि चेहरे की सूजन थोड़े समय के लिए होती है तो ऐसा संक्रमण के कारण हो सकता
है, पर बार-बार ऐसा होने के साथ-साथ चेहरा लाल, ज्वर या सांस लेने में परेशानी होती है तो यह गंभीर
स्थिति का संकेत हो सकता है। ऐसी स्थिति में तुरंत डॉक्टरी परामर्श लेकर पूरा उपचार
करवाएं।
हार्ट फेलियर
के जोखिम घटकों में उच्च रक्तचाप (हाइपर टेंशन) हार्ट अटैक (मायोकार्डियल
इंफारक्शन), असामान्य
हार्ट वाल्व, हृदय का बड़ा होना
(कार्डियोमायोपैथी),
हृदय की व्याधि और डायबिटीज का पारिवारिक इतिहास शामिल हैं।
पैरों
में सूजन - पैरों में सूजन के भी कई कारण हो सकते हैं, जैसे
मोच, लंबी दूरी तक यात्रा करना, ज्यादा देर तक खड़े रहना, व्यायाम
या फिर खेल-कूद आदि। लेकिन अचानक एक या दोनों पैर में भारी सूजन, लाली
और गर्माहट तथा चलने-फिरने पर पैर में खिंचाव जैसे लक्षण डीप वेन थ्रोम्बोसिस
(डीवीटी)की परेशानी हो सकते हैं। इसमें टांगों की नसों में रक्त के कतरों का जमाव होता है। अक्सर लोग अज्ञानता के कारण इसे नस में खिंचाव, चोट, थकान, सामान्य
संक्रमण या फाइलेरिया मान कर इलाज कराने लगते हैं। सामान्य डॉक्टर भी इसे
फाइलेरिया, सायटिका अथवा नस चढ़ना मान बैठते हैं।
फाइलेरिया के चिकित्सा के नाम
पर कई सप्ताह तक पीड़ितों को औषधि दी जाती हैं या फिर सही व्याधि पकड़ में न आने पर पीड़ित के पैर पर वजन लटकाने की सलाह दी जाती है, जिससे समस्या और अधिक गंभीर हो जाती है। पुरुषों की
तुलना में महिलाएं डीवीटी की शिकार अधिक होती हैं। नियमित व्यायाम न करना, गर्भ
निरोधक दवाओं का अधिक परायोग और हारमोन असंतुलन के कारण भी ऐसा होता है। लंबे
समय तक ऊंची एड़ी वाले फुटवियर पहनने से भी यह आशंका बढ़ जाती है। पैरों में लंबे
समय तक रहने वाली सूजन हृदय रोगों की आशंका को भी दर्शाती है। पैरों की सूजन को कम
करने के लिए गरम पानी में नमक डाल कर उसमें अपने पैरों को डुबोएं। सोने से पहले
पैरों की गरम तेल सेमालिश करें। इससे सूजन व दर्द में कमी आएगी। प्रतिदिन
सूर्य नमस्कार करने से भी रक्त संचार नियमित होता है, जो
सूजन व पीड़ा निवारक है।
आंखों
की सूजन - आंखों की सूजन ज्यादातर संक्रमण, एलर्जी, कॉर्नियल
अल्सर, कंजक्टिवाइटिस, स्टाई, ट्यूमर बनने या वायरल इन्फेक्शन के कारण होती है। आंखें शरीर का सबसे आवश्यक व कोमल अंग होती हैं। उनके उपचार में कोई रिस्क न लें। डॉक्टर के परामर्श से स्टेरॉयड
या एंटीबायोटिक आई ड्रॉप की सहायता से आंखों की सूजन को ठीक किया जा सकता है।
पैरों में सूजन जो प्रातः में कम
और दिन चढऩे के साथ बढ़-बढ़ जाती हो ?
यह हृदय की व्याधि के बढऩे की चेतावनी हो सकती है...
'हार्ट फेलियर' सुनने में ऐसा
लगता है जैसे हार्ट काम नहीं कर रहा है और इसके बाद कुछ नहीं किया जा सकता है। वास्तव में, हार्ट फेलियर
का अर्थ है कि हृदय ठीक से पंप नहीं कर रहा है, जैसा इसे करना
चाहिए।
हाथों
में सूजन - हाथों व उंगलियों में सूजन एक आम समस्या है, विशेषकर
बढ़ती आयु में जब शरीर का मेटाबॉलिज्म घटने लगता है तो यह समस्या विशेषरूप से देखी
जाती है। ऐसा एडियोपैथिक एडिमा के कारण होता है। ऐसे में हाथों के कुछ सरल व्यायाम
और स्ट्रेचिंग सहायक हो सकते हैं। हालांकि कुछ स्थितियों में यह सूजन लिवर व किडनी
रोग का संकेत भी होती है। इसके अतिरिक्त हृदय रोग, गठिया, रक्त विकार, हाइपो थाइरॉएड, रूमेटाइडअर्थराइटिस में यह एक
महत्वपूर्ण संकेत है। इस स्थिति में शरीर के विभिन्न जोड़ों में सूजन आ जाती है।
त्वचा संक्रमण के कारण भी ऐसा होता है। सामान्य व्यायाम व मसाज से लाभ न मिलने पर
डॉक्टर से अवश्य परामर्श करें।
वैसे तो हार्ट
फेलियर गंभीर स्थिति है और इसमें तत्काल चिकित्सा सहायता की आवश्यकता होती है पर
जैसा कि इसके नाम से लगता है, इससे मौत होना जरूरी नहीं है। अच्छी तरह इलाज किया
जाए तो मरीज सामान्य जीवन जी सकता है और बार-बार कार्डियोलॉजिस्ट के पास जाने की
आवश्यकता नहीं होती है। सही उपचार से आपके हृदय को सहायता मिलेगी और यह सामान्य
ढंग से काम कर पाएगा।
जीभ
में सूजन - जीभ में कई कारणों से सूजन आ सकती है, जैसे - औषधयों का साइड इफेक्ट, एलर्जी, हारमोन थेरेपी। इसे एंजियोडिमा कहते हैं। इस स्थिति
में संक्रमण त्वचा के भीतर गहराई में पहुंच जाता है। हमारी जीभ एपिथेलियम नाम की
कोशिकाओं से बनी होती है। इसकी सतह पर बने टेस्ट बड्स से ही हमें खट्टे, मीठे
या कड़वेपन का अनुभव होता है। जब जीभ पर सूजन आ जाती है तो टेस्ट बड्स भी सूज जाते
हैं, जिसकी वजह से सांस लेने में भी असुविधा होती है। इस सूजन की अनदेखी न करते हुए
तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।
हार्ट फेलियर
का आम कारण कोरोनरी आर्टरी डिजीज यानी छोटी रक्त कोशिकाओं का संकरा होना है जो
हृदय को खून और ऑक्सीजन की सह्रश्वलाई करती है। इससे हृदय की मांसपेशियां कुछ समय
में या अचानक कमजोर हो सकती हैं। अनियंत्रित उच्च रक्तचाप दूसरा कारण है जो हृदय
की मांसपेशियों में सख्ती लाता है और आखिरकार मांसपेशियां कमजोर हो जाती हैं।
पैर या हाथ में किसी भी
तरह की समस्या होने अथवा हल्का-सा भी डी.वी.टी. का संदेह होने पर - तुरंत किसी डॉक्टर
को दिखाना चाहिए,
ताकि प्रारंभिक अवस्था में ही इस व्याधि पर नियंत्रण पा
लिया जाए।
क्या है समुचित चिकित्सा - ऐसे पीड़ितों के चिकित्सा में अत्याधुनिक डॉप्लर जांच, ईको कार्डियोग्राफी, एंजियोग्राफी तथा पल्मोनरी इम्बोलिज्म
का पता लगाने के लिए फेफड़े और फेफड़े की नली की विशेष जांच (वेंटिलेशन परफ्यूजन
लंग स्कैन) व मल्टी सी.टी. एंजियो आदि की जांच विशेष रूप से करना चाहिए।
हार्ट फेलियर
के मामले में आपके लक्षण भी दूसरों से मिलें, यह आवश्यक नहीं
है। कोई भी निश्चित रूप से यह नहीं बता सकता है कि किसे ऐसा होगा पर जोखिम घटक ज्ञात
हैं। जोखिम घटकों की जानकारी होने और प्रारम्भ में ही उपचार के लिए डॉक्टर को दिखाना
हार्ट फेलियर के बचाव का सबसे अच्छा उपाय है।
इससे कैसे
बचा जाए - इस व्याधि की रोकथाम के लिए नियमित व्यायाम करना चाहिए। प्रतिदिन तीन से चार किलोमीटर तक टहल करने तथा पैरों की कसरत करने से पैरों की शिराओं में ऑक्सीजन रहित गंदे रक्त को
रुकने का मौका नहीं मिलता और मांसपेशियों का पम्प अच्छी तरह काम करता है। लंबे समय
तक बेड रेस्ट में रहने वाले लोगों, कैंसर तथा लकवा के पीड़ितों, नवजात शिशुओं की माताओं तथा गर्भ
निरोधक गोलियों एवं हारमोन का सेवन करने वाली महिलाओं को विशेष रूप से सावधान रहना
चाहिए।
हमारा शरीर
हृदय की पंपिंग पर निर्भर करता है और इसी से ऑक्सीजन और पोषण के दृष्टि से समृद्ध रक्त शरीर की कोशिकाओं में पहुंचता है। जब कोशिकाएं उपयुक्त ढंग से पोषित होती हैं
तो शरीर सामान्य ढंग से काम कर सकता है। हार्ट फेलियर की स्थिति में कमजोर हृदय
कोशिकाओं को पर्याप्त रक्त की आपूर्ति नहीं कर पाता है।
हार्टफेलियर
की स्थिति में पहली पंक्ति का उपचार औषधियों और जीवनशैली में सुधार है। जो पीड़ित हार्ट फेलियर की एडवांस स्टेज में हैं, उनके मामले में कार्डियक रीसिनक्रोनाइजेशन थेरेपी
(सीआरटी) को हार्ट फेलियर के उपचार के प्रभावी रूपों में एक माना जाता है। इसमें
इंह्रश्वलांट करने योग्य एक उपकरण का उपयोग किया जाता है जो हृदय की पंप करने की
कार्यकुशलता को बेहतर करता है। हार्ट फेलियर के जिन मरीजों के हृदय में बिजली के
कंडक्शन से संबंधित समस्या होती है, उनके मामले में रीसिनक्रोनाइजेशन थेरेपी हृदय से
पूरे शरीर में खून का प्रवाह बेहतर करती है। परिणामस्वरूप लक्षण कम हो सकते हैं।
तब अस्पताल जाने और मृत्यु की आशंका भी कम हो जाती है।
सूजन
को कम करने के उपाय-
डॉ. रमेश चंद्र पवित्रन के अनुसार - सामान्य स्थितियों में जीवनशैली व खान-पान में बदलाव
करके सूजन की समस्या से मुक्ति पायी जा सकती है।
- हरी सब्जियों व फल के सेवन से विटामिन बी-वन की कमी पूरी होती
है। - प्रोटीन के लिए दूध, सोयाबीन व दाल का सेवन लाभकारी होता है। इनके
सेवन से शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। रक्त की कमी पूरी होती है, जो सूजन का एक मुख्य कारण है।
- एडिमा की स्थिति में शराब और कैफीनयुक्त चीजों का अधिक सेवन
नहीं करना चाहिए। इससे शरीर में पानी की कमी हो जाती है और पानी के अवशोषण की
समस्या बढ़ जाती है। - हर्बल चाय पिएं। - विशेषतौर पर अजवायन की चाय सबसे अच्छी मानी
जाती है।
- शरीर की आवश्यकता से अधिक नमक का सेवन भी पानी के अवशोषण की
समस्या को बढ़ा सकता है। - अधिक नमकयुक्तचीजों
के सेवन से बचें।
- मोटापा होने पर सबसे पहले थोड़ा वजन घटाएं। - -- एक कैलोरी चार्ट
बनाएं और उसके आधार पर खान-पान की सूची तैयार करें।
- प्रतिदिन एक्सरसाइज करने की आदत डालें। इससे पसीने के रूप में
शरीर का अतिरिक्त पानी निकल जाता है। त्वचा भी अच्छी रहती है। - घूमना, टहलना, तैराकी या नृत्य, अपनी सुविधानुसार आप किसी भी व्यायाम का चुनाव कर सकते हैं।
- शरीर की नसों, तंत्रिकाओं
और मांसपेशियों के कामकाज को नियंत्रित करने में सोडियम के साथ पोटैशियम का भी
योगदान होता है। - पोटैशियम के लिए प्रतिदिन कम से कम पांच फल और सब्जियों का सेवन अवश्य करें। - अखरोट, बादाम, मूंगफली आदि भी पोटैशियम के अच्छे स्रोत हैं।
- शरीर में पानी के संतुलन को बनाए रखने में विटामिन बी-6 बहुत सहायक है। - ब्राउन राइस विटामिन बी-6 के अच्छे स्रोत हैं।
- विटामिन बी-5, कैल्शियम
और विटामिन डी सूजन को कम करने में लाभकारी हैं। - नियमित रूप से कुछ देर प्रातःकाल धूप का
सेवन करें।
- खाने में कैल्शियम के स्तर की जांच करें।
- प्रतिदिन टोंड दूध पिएं।
- दही,हरी पत्तेदार सब्जियां और अंजीर खाएं। औषधि - 1. Immu Rich - 1 कैप्सूल, 3 बार ( भोजन से पहले ) 2. Omega Rich - 1 कैप्सूल, 3 बार ( भोजन के बाद ) 3. Cal Rich - 1 कैप्सूल, 3 बार ( भोजन के बाद ) 4. Green Rich - 1 कैप्सूल, 3 बार ( भोजन के बाद ) प्रयोग किया जा सकता है । विशेष जानकारी हेतु संपर्क करें - 9135167135 पर.
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